कुछ पल एकान्त चार दीवारों के अन्दर
कुछ गपशप कुछ गरमा गरमी
बाकी समय अकेले टीवी के संग
विवश हमने छोड़ दिया समाज
पार्टी शारटी परिनिंदा परिचर्चा
रामभरोसे ज़िन्दगी और कल की आशा

बाहर अम्बर है नीला सुनसान रास्ते
पक्षियों की चछचछाहट जो लुप्त हो गयी थी
दुनिया की दौड़-धूप के बीच
समय कहाँ था जो ठण्डी आह भरकर सुनें
चेतना और विवेक की नसीहत
हम लग गये पैसा बटोरने के व्यापार में

एक छोटे परमाणु ने गति को रोका
कहा मनुष्य बहुत कर ली माना मानी
अब देख क्या मेरी क्षमता ये मेरी वाणी

व्यापार बन्द मजदूरों की आमदनी बन्द
बीमारी भुखमरी का तांडव चालू
इस शान्त वीराने में मची है तबाही

अम्फान एक तूफान आया
लोगों का घर समेटे ले गया
जिन्दा बस नहीं कोई मक़सद
आगे अन्धेरा खतरनाक दूर दूर तक

ऐ मेरे मौला ये कैसा खेल तूने दिखाया
बस। बस बहुत हो गया
बखश दे गरीबों को ये मेरी इलतजा